हजरत #नियाज़_अली_शाह सरकार की करामात💐💐💐
✍️ जावेद शाह खजराना (लेखक)
दादा पीर का मजाक उड़ाना भारी पड़ा। 👇
हजरत नियाज अली शाह सरकार रह0 ने अपनी ज़िंदगी के आखरी 20 साल #इंदौर की सरजमीं पर बिताएं।
लगभग 1873 ईस्वी में जब आप इंदौर आए उस वक्त लखनऊ से आए मुस्लिम बुनकरों (अंसारी) से रानीपुरा नया-नया आबाद ही हुआ था।
आपने #रानीपुरा की कच्ची #मस्जिद में क़याम किया। 👍
मस्जिद में रहकर आप #अज़ान भी देने लगे। जैसे ही आप अजान देते आसपास के मंदिरों की मूर्तियां गिरने लगती। ये भी आपकी रूहानी अज़ान का करिश्मा था।
फिर आप #लुनियापूरा कब्रस्तान में रहने लगे। ❤
एक बार की बात है । रानीपुरा के कुछ बिगड़ैल-शरारती लड़के हजरत का इम्तिहान लेने औऱ मजाक उड़ाने की गरज से लुनियापुरा #कब्रस्तान पहुँचे।
उसमें से एक दोस्त को मुर्दे की एक्टिंग करके लेट जाने को कहा। दोस्त के लेट जाने के बाद उन्होंने उसे सफेद चादर से ढंक दिया।
लड़के हजरत नियाज़ अली शाह रह0 के पास जाकर बोले " बाबा #जनाजे की #नमाज अदा कर दो।"
नियाज अली शाह सरकार रह0 ने पूछा जिंदा की पढ़ाना है या मुर्दे की?
शरारती लड़के बातों में छिपी गहराई को समझ नहीं पाए।
बोले _"मुर्दे की।"
आप ठहरे #अल्लाह वाले आपने नमाजे #जनाजा पढ़ा दी।🌷
नमाज पढ़ाने के बाद लड़के बाबा का मजाक उड़ाने लगे कि तुमने तो ज़िंदा की नमाज पढ़ी है तुम्हें तो पता भी नहीं हमारा दोस्त ज़िंदा है ।
फिर उन्होंने मुर्दा बने अपने दोस्त को ताली बजाकर उठाना चाहा। लेकिन उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई। वो नहीं उठा। हिलाने-डुलाने से पता चला कि वो तो हकीकत में मर चुका है। 🌙
इस तरह अल्लाह के वली का मजाक उड़ाना उन्हें भारी पड़ गया।
ये खबर आग की तरह इंदौर में फैल गई।
हजरत की दूसरी करामात भी जाहिर हो गई।
इंदौर के महाराज #तुकोजीराव_द्वितीय ने उस समय अपने नाम से नई-नई कालोनी #तुकोगंज बसाई थी।
वही पर हजरत को रहने के लिए जगह दे दी।
नियाज अली शाह सरकार खानगाह बनाकर तुकोगंज में रहने लगे। नियाज अली सरकार की इबादत औऱ करिश्मों के चर्चे फैलने लगे। बाद में भी आपसे बहुत-सी करामातें ज़ाहिर हुई।
दिन-ब-दिन हजरत के मुरीदों और चाहने वालों की तादाद बढ़ने लगी। मस्जिद की जरूरत महसूस हुई।
आपने एक मस्जिद की तामीर करवाई। आजकल जिसे हम तुकोगंज की मस्जिद कहते है। उसी में आप इमामत भी करते।
7 जून 1893 ईस्वी में आपने इसी मस्जिद के सहन में पर्दा फरमाया।
मस्जिद के सहन में आपको सुपुर्दे ख़ाक किया गया।
आज वो मुकाम महात्मा गाँधी रोड़ , तुकोगंज कहलाता है।
दुआग़ो:- जावेद शाह फ़क़ीर
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