खजराना' नामकरण की हक़ीकत क्या है?
अफसाने तो बहुत है लेकिन सच से आँखें मूँदकर
दुष्प्रचार पर यकीन करना समझदारी नहीं है।
मीडिया के झूठ को भी पहचानिए...….
✍ जावेद शाह खजराना (लेखक)
आज #प्रभातकिरण अखबार में ये खबर छपी कि #खजराना गणेश मंदिर के आसपास राजा-महाराजाओ की कोठियां थी। उसमें होलकरों का #खजाना रखा था।
इसलिए इस इलाके का नाम खजराना पड़ गया।😃
अब चलते है कोठी की हकीकत की तरफ 👇
मंदिर के आसपास अगर राजा-महाराजाओ की शानदार कोठियां थी? तो वो सब कोठियां कहाँ चली गई?
उन टूटी-फूटी कोठियों के कोई भी अवशेष आज तक किसी भी खजराने वालों को क्यों नहीं दिखाई दिए? जबकि इंदौर को बसे सिर्फ 300 बरस हुए है?
उन कोठियों को तोड़कर फिर क्या निर्माण हुआ?
कोठियों के स्थान पर आजकल क्या है?
जबकि खजराना मंदिर के आजु,-बाजू में ऐसी कोई कोठी थी ही नहीं। मंदिर से कोसों दूर आनंद बाज़ार में
'खजराना कोठी' है जहाँ सावित्रीबाई साहिबा रहती थी।
ये कोठी आज भी हैं।
इस कोठी की ऊंची सफ़ेद मीनार दूर से दिख जाती थी , जो मैंने भी देखी है।❤
दूसरी कोठी हजरत नाहरशाह वली की दरगाह के ठीक सामने बनी थी जिसका मलबा आज भी पड़ा है ( सिलाई सेंटर के पीछे) 🕌
खैर अब दूसरे अख़बार दैनिक भास्कर की खोजी खबर पढ़िए😢
ये भी बहुत दूर की कौड़ी लाए थे। इन्होंने लिखा कि खजराना के एक कुएँ में होल्करों ने अपना खजाना छिपाया। इसलिए इस इलाके का नाम खजराना पड़ गया।
इन दोनों अखबारों ने नामकरण को लेकर अलग-अलग कहानियां लिखी है । एक लिख रहा है खजाना कुएँ में था तो दूसरा लिख रहा है खजाना कोठी में था।
मैंने इन दोनों अखबारों की खबर साथ में पोस्ट की है देखिए। 😊
लेकिन दोनों अखबारों में एक चीज समान है वो है खजाना । 🌷
अब मैं जावेद शाह खजराना आपको बतौर सुबूत खजराना के नामकरण को लेकर कुछ बताना चाहता हूँ।
दोनों अखबारों ने लिखा होल्करों का खजाना।
जिस वक्त कुएँ औऱ कोठी में खजाने रखने की बात लिखी है उस वक्त से सदियों पहले से ही इस इलाके का नाम खजराना प्रचलन में था।
होल्कर वंश की उत्तपत्ति से भी पहले अकबर के शासन में खजराना ओर कम्पेल एक परगना आबाद था।
जानिए होल्कर इंदौर में कब आए ?
सन 1734 में इंदौर आते ही होल्करों के पास इतना खजाना कहाँ से कैसे आ गया? जबकि उस वक्त वो खुद मल्हारगंज में खेमा लगाकर रहते थे। इंदौर के पहले शासक मल्हार राव होल्कर तो बाजीराव के सूबेदार थे उन्हें पाई-पाई का हिसाब पुणे भेजना पड़ता था।
ऐसे में खजाने को छुपाने की बात हजम नहीं होती।
सैनिक अभियानों की व्यस्तता के कारण उन्होंने स्थायी निवास के लिए खासगी जागीर देने के लिए छत्रपति साहू से निवेदन किया। पेशवा बाजीराव ने सन् 1734 ई में मल्हार राव की पत्नी गौतमाबाई होल्कर के नाम खासगी जागीर तैयार करवायी, जिसमें इंदौर भी था।
मल्हारगंज के खेमे से निकलकर सन् 1747 में भव्य राजप्रसाद का निर्माण शुरू किया जो राजबाड़ा कहलाया। यह बन भी न पाया था कि 1761 ई में अब्दाली के हाथों हुई पराजय को मल्हारराव सह न सके और 1766 ई. में चल बसे।
मतलब राजबाड़ा अधूरा रह गया।
फिर वो खजराने में कोठी कैसे बनवाते?
उनके बाद शासिका बनी देवी अहिल्या जो इंदौर नहीं बल्कि महेश्वर में रहती थी। इंदौर में वो मुश्किल से कुछ समय रही। सन 1795 ईस्वी में महेश्वर में वो भी चल बसी। वो महेश्वर में रहकर 100 किलोमीटर दूर खजराना में खजाना क्यों छुपाती? 😅
सन 1818 तक होल्कर इंदौर नहीं बल्कि महेश्वर में रहते थे।
आज भी वही रहते हैं। फिर इस कथित खजाने को खजराना में रखने के लिए कोठी या कुएँ की जरूरत कब और कैसे पड़ गई?😊
मेरे पास मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वारा हमारे शाह परिवार यानि हजरत नाहरशाह वली रह0 के खादिमों को दी गई सनद सुरक्षित है जिसकी कॉपी इस पोस्ट में डाली है देखिए। 👇
इस सनद में 'होल्कर बहादुर को खजराना जागीर में 50 बीघा जमीन नाहर शाह वली के ख़ादिम हजरात को देने' का हुक्म है । शाही मोहर पर 11 रजब 1193 हिजरी तिथि अंकित है इसके मुताबिक़ 25 जुलाई 1779 बरोज इतवार ईस्वी की तारीख बनती है।
उस वक्त देवी अहिल्या बाई रानी थी।💕
इस सनद से ये साबित होता है कि उस यानि 1779 ईस्वी के वक्त भी खजराना इलाका मशहूर था।
इसलिए खज़ाना को लेकर खजराना' के नामकरण की कहानी बेबुनियाद है। 😡
खजराना की ठीक सरहद पर छोटा खजराना आबाद है।
दैनिक भास्कर कार्यालय के ठीक सामने। जो अब छोटी खजरानी कहलाता है। अगर खजराने का नाम खजाने को लेकर पड़ा तो छोटी खजरानी का नाम भी जरुर छोटे खजाने से छोटी खजरानी पड़ा होगा ।😃😃😃😃
ये दोनों इंदौर के प्रतिष्ठित ओर भरोसेमंद अखबार है लोग इंनकी खबरों पर आंखें मूँदकर भरोसा करते हैं उन्हीं पाठकों में मेरा भी शुमार है।
इसलिए मेरी गुजारिश है कि बिना सुबूत के ऐसी खबरों को छापने से परहेज करें। पाठक भी इन खबरों पर विश्वास ना करें।
खजराना ज़िंदाबाद
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